‘तत्त्वचिन्तन’ का लोकार्पण एवं बृहद चर्चा

यह एक पुस्तक नहीं, एक शोध है। इस पुस्तक में पूरी शास्त्रीयता के साथ लेखक ने अपने विषयों को प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक के लेखों में विश्लेषण की गुंजाइश नहीं, केवल स्वीकृति है। इन लेखों को पाठ्यक्रमों में रखने से आज की चेतना के लिए बहुत बड़ा पथ-प्रदर्शन हो जायेगा। मुझे पुस्तक की तत्समता ने बहुत प्रभावित किया। इतिहास ने बहुत प्रभावित किया। इस पुस्तक का एक लेख – ‘गंगा-सागर मिलन’ पढ़कर उसकी काव्यात्मकता के कारन मुझे पंत याद आ गए। इस पुस्तक में रोचकता है। वह रोचकता कहने…

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