प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को राजभाषा विभाग का ‘राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान’

बिहार सरकार की ओर से वर्ष 2020 के लिए राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान की घोषणा साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के नाम की हुई है। उनका कहना है कि जीवन में उन्हें कई बड़े पुरस्कार मिले हैं लेकिन पड़ोसी राज्य बिहार का सर्वोच्च सम्मान पाने में आत्मिक खुशी मिलेगी। प्रो. तिवारी ने बताया कि उन्हें उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश के सर्वोच्च साहित्य सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। अब बिहार ने भी सम्मानित कर दिया। 20 जून 1940 को कुशीनगर…

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भगवती प्रसाद द्विवेदी को राजभाषा विभाग का ‘भिखारी ठाकुर पुरस्कार’

बलिया के मूर्धन्य साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी को बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा वर्ष 2020 का भिखारी ठाकुर पुरस्कार दिया गया है। भगवती प्रसाद द्विवेदी जी हिंदी व भोजपुरी के वरिष्ठ साहित्यकार हैं। अभी हल ही में उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘महेन्दर मिसिर के चुनिंदा भोजपुरी गीत’ का प्रकाशन सर्वभाषा ट्रस्ट द्वारा किया गया है। सर्वभाषा ट्रस्ट परिवार की ओर से उन्हें अनंत बधाइयाँ।

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ऑन लाइन कवि सम्मेलन आयोजित

कोरोना काल में मंचीय गतिविधियां लगभग बंद है। फिर भी साहित्यकार बंधु सोशल प्लेटफार्म का उपयोग कर साहित्यिक गतिविधियों जारी रखे हैं। विभिन्न संगठन ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं।इसी क्रम में भोजपुरी साहित्यिक मंच ने १८ जुलाई को अपने पेज पर भोजपुरी फाउंडेशन के सहयोग से राष्ट्रीय भोजपुरी कवि सम्मेलन आयोजित किया । जिसमें देश के कोने – कोने से कवियों ने भाग लिया । भोजपुरी साहित्यिक मंच के अध्यक्ष श्री महेंद्र पाण्डेय ने सभी का अभिनंदन किया। मुख्य अतिथि के रूप में झारखंड से श्री मनोज कुमार अग्रवाल…

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सत्य नारायण मिश्र ‘सत्तन’ जी की छठवीं पुण्यतिथि

गोरखपुर। “भोजपुरी में ऊ ताकत बा कि खाली रचना के बल पर एके स्थापित कइल जा सकत बा। दुनिया के 18 देसन में भोजपुरी ओइसे बोलल जाला जइसे आपन भासा होखे। संसार में यह समय जेतना लोग भोजपुरी बोले वाला बाटें ओतना हिंदी के नईखें। ई भोजपुरी ‘सत्तन जी’ से आ उनके रचना से सीखल जा सकत बा। लिखवइयन के जवन अपने गांँव गिराव में होत बा ऊहे लिखे के पड़ी। एह क्षेत्र में सत्तन जी अइसन अकेल आदमी रहलें जवन भोजपुरी में खाली लिखत नाइ रहलें बल्कि भोजपुरी के…

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‘सर्वभाषा’ देश की 49 भाषाओं में प्रकाशित पहली पत्रिका

भाषा भाव सम्प्रेषण का माध्यम है। मानव-विकास के महत्त्वपूर्ण सोपानों में आग, पहिया के बाद भाषा का सबसे अधिक महत्त्व है। भाषा ने बर्बर मानव को सभ्यता दी। मानव के भाव-सम्प्रेषण के अभाव को स्वभाव दिया। परन्तु कई बार भाषा के नाम पर लड़ते-भिड़ते देखा जाता है जो अमानवीय लगता है। ‘सर्व भाषा ट्रस्ट’ द्वारा भाषा,साहित्य, कला और संस्कृति को समर्पित पत्रिका ‘सर्वभाषा’ में मानवीय सरोकारों और भाषिक एकता का जीवंत उदहारण मिलता है। यह पत्रिका केशव मोहन पाण्डेय के सम्पादन में प्रकाशित होती है। पत्रिका में सभी भाषाओं और…

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साधना और अनुभव की चासनी से सराबोर ‘साथ गुनगुनाएंगे’

जैसा कि हम सभी को यह ज्ञात है कि यह अरबी साहित्य  की प्रसिद्ध काव्य-विधा  है जो बाद में फारसी,उर्दू नेपाली और हिन्दी साहित्य और भोजपुरी साहित्य  में भी बेहद लोकप्रिय हुई। अरबी भाषा के इस शब्द का अर्थ है औरतों से या औरतों के बारे में बातें करना।परंतु समय के साथ इसके फ़लक में जबरजस्त विस्तार हुआ। दुष्यंत कुमार ने गजल की विषय वस्तु में सामाजिक-राजनैतिक जिंदगी का सच पिरोकर उसे जो विस्तार दिया था, उसे एडम गोंडवी ‘बेवा के माथे कि शिकन’ तक ले गए । कहने का तात्पर्य यह कि आज…

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ऐ मेरी दुखमयी रातें

ऐ मेरी दुखमयी रातें क्यों बिलखकर रो न लेती ? हैं  उमड़ते  मेघ  तेरे  इस  हृदय  स्नेहिल  पटल  पर टूटते मिटते गरजते हैं बिखरते इस अचल पर क्यों न तुम खुद के बरसकर इस नयन में हो न लेती ऐ मेरी दुखमयी रातें क्यों बिलखकर रो न लेती ? क्षण भर उजाला बस लिए आकाश में बिजली चमकती वेदना के फिर अँधेरों में मेरी रातें सिमटती सिसकियाँ भर कर लिपटकर गोद में क्यों रो न लेती ऐ मेरी दुखमयी रातें क्यों बिलखकर रो न लेती ? खिड़कियों से झाँक आ…

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बुजुर्गों का ख़्याल रखना हमारा कर्तव्य

किसी ने सच ही कहा है कि हम सब कुछ बदल सकते है, लेकिन अपने पूर्वज नहीं। उनके बिना न ही हमारा वर्तमान सुरक्षित है और ना ही भविष्य की नींव रखी जा सकती है। हमारे पूर्वज ही इतिहास से भविष्य के बीच की कड़ी होते है। इन सबके बावजूद अफ़सोस की आज हम अपने पूर्वजों का सम्मान तक नहीं कर पा रहे है और न ही उनकी दी हुई सीख पर अमल कर पा रहे हैं। मातृ देवों भवः, पितृ देवों भवः से अपने जीवन का आरम्भ करने वाला…

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अपनापन तलाशने वाली स्त्री के सफरनाने का दूसरा नाम है ‘स्त्री का पुरुषार्थ’

पुरुषार्थ हर मनुष्य का सत्य है। यह लक्ष्य हर मानव जीवन का है। जिन चार पुरुषार्थ का नाम लिया जाता है, उन्हें संसार भर की स्त्रियां पुरुषों से कहीं अधिक जीती है। जिसे पुरुषार्थ चतुष्टय कहते हैं, उन्हें हासिल करती हैं। चार्वाक दर्शन हो या महर्षि वात्सयायन, उनके द्वारा प्रतिपादित धर्म, अर्थ और काम का निर्वहन करते हुए वह हमेशा आगे बढ़ती रही है। अपना स्त्री धर्म निभाती रही है। इसी तरह अर्थ का तात्पर्य सिर्फ अर्थ से नहीं उस जीवन संघर्ष से है, जिससे गृहस्थी चलती है और सामाजिक…

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कैसे जन्म दूं कविता? 

तुम्हें कैसे जन्म दूं कविता, पहले उस प्रसव पीड़ा से मुझे गुजरने तो दोे, जिससे जन्मती है कविता। कुम्हार की चाक पर मिट्टी सा मुझे गढ़ने दो फिर आग में झोंक कर कुछ दिन पकने तो दो, फिर रचूंगी कोई कविता। ब्रह्मांड की परिक्रमा कर मुझे आने दो अभी, तारों और पृथ्वी का तालमेल तो समझने दो। प्रेमिकाओं का विरह जीने दो, प्रेम में लालायित होने दो, प्रेमी के प्रथम स्पर्श का अहसास तो होने दो, फिर रचूंगी कविता। बच्चों को पहला कदम रखते हुए मुझे निहारने दो, आत्मा को…

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